सोमवार, 11 मई 2020

बस ५ करोड़ ही तो थे हम...

मैं कई बार ये सोच कर हैरत में पड़ जाता हूं कि क्या प्रवासियों को संभालना सही में मुश्किल है। कई तरह के पोस्ट देखे, कुछ में मजदूरों की लाचारी, कुछ में सरकार की अक्षमता तो कुछ में मजदूरों के असीम कष्ट का जिक्र पाया, कुछ में मजदूरों की बेवकूफी का जिक्र पाया कि कोई कैसे ट्रैक पर सो सकता है। वे सब पोस्ट सही है और किसी ना किसी दृष्टिकोण के आधार पर लिखी गई हैं। पर मजदूरों कि इस समस्या के मूल में ये प्रश्न है कि क्या केंद्र सरकार या राज्य सरकारें इन मजदूरों के लिए वास्तव में कुछ कर सकती थी?

अगर २०११ के जनसंख्या रिपोर्ट को देखा जाए तो आप पाएंगे कि प्रवासी मजदूरों कि संख्या ४५ करोड़ है। इतनी बड़ी संख्या को देखकर यही लगता है कि कोई भी सरकार आखिर कैसे इतने लोगों को इनके घर पहुंचा सकती है? लेकिन आपको जानकर हैरत होगी कि इन ४५ करोड़ में से ४० करोड़ अपने ही राज्य के अंदर प्रवासी हैं। मूल समस्या सिर्फ 5 करोड़ प्रवासियों को या तो उनके घर पहुंचाने या फिर उनके लिए समुचित व्यवस्था करने का है। अगर कुछ मुख्य राज्यों में बाहरी प्रवासियों की संख्या देखी जाए तो तस्वीर और साफ हो जाएगी। जैसे महाराष्ट्र में बाहरी प्रवासी मजदूरों कि संख्या ३१ लाख है, जबकि गुजरात में यह संख्या ३९ लाख है, वहीं पंजाब में यह संख्या करीब २५ लाख है। इन आंकड़ों को देखकर तो यही समझ में आता है कि अगर सरकारों में राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो इतने लोगों की व्यवस्था करना कोई बड़ी बात नहीं है, वह भी तब जब देश की जनता लोगों को मदद करने में पीछे नहीं है।

अगर भारतीय रेलवे की क्षमता को ही देखा जाए तो आंकड़ों के मुताबिक ३ करोड़ लोग २०००० रेलगाड़ियों कि सहायता से हर रोज़ सफर करते है। अगर इसमें सड़क परिवहन भी जोड़ दिया जाए तो यह संख्या और बढ़ जाएगी, क्यूंकि नेशनल हाईवे अथॉरिटी के अनुसार कुल पैसेंजर परिवहन का ८० फीसदी सड़क परिवहन के द्वारा ही पूरा किया जाता है।

ऐसे में सवाल ये है कि क्या इन ५ करोड़ लोगों को पूरे सम्मान के साथ अपने घर पहुंचाने का विकल्प सोचा नहीं जा सकता था? अगर ऐसा होता तो आज ये मजदूर सड़कों पर भटकते नहीं दिखते और ना ही सरकार को इतनी आलोचना झेलनी पड़ती। संकट के समय एक समाज जरूरतमदों का ख्याल कैसे रखता है इसी से उसकी मजबूती का स्तर तय होता है।

सोमवार, 7 सितंबर 2015

सिर्फ सोच से नहीं बनेंगे शौचालय

कल यहीं के एक पासआउट विद्यार्थी से बात हो रही थी, जो एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ के साथ बिहार के ही एक दूर-दराज के जिले में सामाजिक अभिप्रेरणा के कार्य में लगा है। उसका काम गांव में लोगों को शौचालय बनवाने और उसके प्रयोग को बढ़ावा देना है।

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

PDS is OK but what about PTS?

Last evening when I was going back to home by a shared auto a woman signalled auto driver to stop with a huge bundle of rags. First driver hesitated to stop but suddenly he realized he could make money from the extreme back seat of his auto. He stopped and asked woman to take extreme back seat. But woman started begging for half of the fare. She insisted that extreme back seat would be anyway remaining vacant. Finally she got the seat and reached to the destination in half fare. It was really disturbing to see that she was willing to walk for hours instead of paying fare. This is the plight of thousands of poor people living in small towns.

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

सरकार आपकी, अदालतें आपकी और मीडिया भी आपका

यह पंक्तियां अक्सर उस तबके के लोगों द्वारा कही जाती रही है जिन्हें देश के मिजाज के साथ तालमेल बिठाने का मौका ही नहीं मिला। सरकार बनाने के लिए वह जाति, धर्म, संप्रदाय में बंट कर वोट बैंक बने या जो इन खांचों में नहीं समाए वे पैसे पर खरीदे गए। अदालतें जो न्याय के मंदिर कहे जाते हैं यह संयोग है या कुछ और कि अधिकतम सजा पाने वाले इसी तबके से आते हैं। यहां तक कि पिछले कुछ सालों में जिन लोगों को फांसी दी गई वे इसी तबके से ताल्लुक रखते हैं। यह कोई मेरा आकलन नहीं है बल्कि देश के मिसाइल मैन कहे जाने वाले और देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के हैं। अब इस क्रम में मीडिया भी खुलकर सामने आ गया है जहां वह पक्षपात करता दिख रहा है। ताजा उदाहरण है मुंबई के कैंपा कोला सोसाइटी के तोड़े जाने का।

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

न मिटी गरीबी और न रहे गरीबों के 'रहनुमां' लालू

"इधर के लोग आंकड़ों की बात करेंगे और उधर के लोग भी आंकड़ों की बात करेंगे, लेकिन मैं आंकड़ों की बात नहीं करूंगा बल्कि गरीब गुरबों की बात करूंगा जो मंहगाई के बोझ तले दबा जा रहा है" कुछ इसी अंदाज में लोकसभा में बीच की पंक्ति में खड़े होकर गरीबों की राजनीति करने वाले लालू ने अपने दोनों तरफ बैठे सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के नेताओं पर वार किया था। लेकिन विडंबना देखिए उसी लोकसभा में तथाकथित बहुसंख्यक गरीबों के राजनेता लालू अब नहीं दिखेंगे। चारा घोटाले में पांच साल की कैद होने के बाद अब वह अगले 11 सालों तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। तो क्या यह गरीबों की हार है या गरीबी का मजाक है?

सोमवार, 11 जनवरी 2010

चटकती स्टिक के साथ कैसे डटे रहें हॉकी खिलाड़ी

विश्व कप से ठीक पहले हॉकी खिलाड़ियों की हड़ताल ने देश के राष्ट्रीय खेल की खस्ता हालत को एक बार फिर उजागर कर दिया। एक अरब जनसंख्या के सपनों को पूरा करने, उनकी आशाओं के दबाव को झेलने और राष्ट्रीय खेल के सम्मान को बचाए रखने के लिए जूझने वाले हॉकी खिलाड़ियों को 25 हजार माहवार देने के लिए भी हॉकी इंडिया के पास पैसे नहीं हैं।

यह कोई पहली बार नहीं है, जब हॉकी की दुर्दशा सबके सामने आई है। धनराज पिल्लै की मजबूरी भरे आंसुओं को कौन भूल सकता है जब वे कैमरे के सामने ही रो पड़े थे। उस वक्त भी बहुत हाय तौबा मची, लेकिन फिर स्थिति वही ढाक के तीन पात।

अगर हम कुछ आंकड़ों पर गौर करें तो यह स्थिति और साफ हो जाएगी। हॉकी टीम की प्रायोजक कंपनी सहारा इंडिया ने सिर्फ 2004 में ही टीम के प्रत्येक खिलाड़ियों को 25 हजार रुपये माहवार दिए थे। उसके बाद से यह बंद है। अब खिलाड़ियों को टूर्नामेंट में शिरकत करने के आधार पर पैसे दिए जाते हैं, वह भी सरकार द्वारा मुहैया कराई गई राशि से। यही नहीं अगर कोई खिलाड़ी मैच नहीं खेल रहा होता तो उसके खाने तक के पैसे हॉकी फेडरेशन नहीं देता।

यही कारण है कि हॉकी खिलाड़ी अपनी निजी कंपनी के लिए खेलना अधिक पसंद करते हैं, लेकिन वहां भी खिलाड़ियों को बहुत ही कम राशि दी जाती है, जोकि प्रतिदिन के आधार पर कुछ सौ रुपये होते हैं। इसके मुकाबले एक रणजी ट्रॉफी में खेलने वाले खिलाड़ी को प्रतिदिन 35 हजार रुपये मिलते हैं। आईपीएल में जिस कीमत पर भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को खरीदा गया अगर पिछले आईपीएल में उनके द्वारा बनाए गए रनों के हिसाब से देखा जाए तो उन्हें प्रति एक रन के लिए 1.5 लाख रुपये दिए गए। क्रिकेट खिलाड़ियों को प्रति वनडे मैच 1.60 लाख और प्रति टेस्ट मैच 2.5 लाख रुपये मिलते हैं। इसके अलावा टूर्नामेंट जीतने पर बोनस अलग से।

क्रिकेट के मुकाबले हॉकी की दयनीयता इससे भी साफ होती है कि सहारा इंडिया मात्र 3.15 करोड़ में ही तीन साल के लिए हॉकी टीम के प्रायोजक बन गया, वहीं क्रिकेट के एक वनडे मैच के लिए सहारा इंडिया को 1.9 करोड़ देना पड़ता है। क्रिकेट के नए संस्करण ट्वंटी20 का प्रायोजक बनने के लिए तो एक मैच में 3 करोड़ देने पड़ते हैं।

यही नहीं जहां क्रिकेट खिलाड़ियों को विज्ञापन से लेकर बड़ी कंपनियों में रोजगार आसानी से मिल जाता है, वहीं हॉकी खिलाड़ी जूझते रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त और राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से नवाजे गए धनराज पिल्लै को भी नौकरी के लिए दर-दर की ठोकर खाना पड़ा था, जब उनकी पुरानी कंपनी महिन्द्रा ने अपनी हॉकी टीम खत्म करने का ऐलान किया था। हालांकि पिल्लै ने बड़ी मशक्कत के बाद इंडियन एयरलाइंस में सहायक मैनेजर की नौकरी पाने में कामयाब हुए थे।

ऐसी खस्ता हालत में होने के बावजूद हॉकी खिलाड़ी अगर अपनी चटकती हॉकी स्टिक से कुछ गोल कर पाते हैं तो यह उनकी देश के प्रति गहरा प्रेम ही है। अब यह हॉकी इंडिया के ऊपर है कि वह कैसे अपने खिलाड़ियों को धन मुहैया कराकर उनको उनकी दयनीयता से बाहर निकालता है।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

`दिल्ली को भी चाहिए एक राज ठाकरे'

''सा...' दिल्ली में भी एक राज ठाकरे की जरूरत है। हमें खुद तो परेशानी हो रही है और ये सा...' बाहर से आकर दिल्ली को अपनी बपौती समझे हुए हैं।'' जी हां, कुछ ऐसे ही शब्द थे उन महानुभाव के सुबह-सुबह, मेट्रो के सफर में, बड़ी संख्या में लोगों के बीच।

अब आप सोच रहे होंगे कि मैं ये आपको क्यों बता रहा हूं। तो जनाब, मैं ये आपको इसलिए बताना चाहता हूं कि जरा इसके पीछे कारण क्या थे वो भी जानिए।

मेट्रो में लोगों की भीड़ से तो आप सब वाकिफ हैं और आप सब कभी न कभी रू-ब-रू भी हुए होंगे। ऐसे ही एक दिन धक्का-मुक्की करते हुए कुछ लोग मेट्रो में चढ़ने की जंग जीत जाने को उतारू थे। ये अलग बात है कि आराम से भी चढ़ा जा सकता है और अगर नहीं चढ़ पाए तो अगली मेट्रो का इंतजार भी किया जा सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है, इसलिए शायद हमारे गृहमंत्री को भी कहना पड़ता है कि दिल्लीवासी अनुशासित हों। खैर, मैं वापस मुद्दे पर आता हूं। हां तो मेट्रो में चढ़ने की जंग जीत जाने के बाद दो लोग और उनके साथ एक महिला ने इस जद्दोजहद के लिए किसी को दोषी साबित करने की सोची। इधर-उधर नजर दौड़ाने के बाद एक मजदूर एक बोरी में सामान लिए निरीह सा खड़ा दिखा। तो फिर क्या था, तोप चलाने के लिए मिल गई उनको मुर्गी।

उन्होंने आव देखा न ताव और बोलना शुरू कर दिया, '' यार ये सुबह सुबह क्या लेकर चढ़ जाते हो''। मैंने सुन कर अनसुना कर दिया। सोचा अब चढ़ने में परेशानी हुई है तो थोड़ा आदमी चिढ़ ही जाता है। इसलिए गलत होने पर भी इसे क्षम्य माना जा सकता है। तभी तपाक से दूसरे ने कहा, '' सुबह-सुबह ध्यान रखा कर यार, ये क्या लेकर चढ़ जाते हो।'' अब मेरे लिए असहनीय था। असहनीय इसलिए था कि अपनी जिंदगी में जो कुछ मैंने सिखा है उसमें अपनी प्रोफेसर के द्वारा सिखाई गई एक बात भी मैंने सिखी है। उन्होंने कहा था कि अगर कुछ भी गलत देखो तो एक बार टोक जरूर दो, अगर इससे एक प्रतिशत भी फर्क पड़ता है तो समझो तुम्हारा काम हो गया। मेरे मन में सीधे उन्ही की बात कौंधी।

मैंने भी सीधे उन महानुभव से कहा, '' क्यों भाई साहब क्या ये अपना सामान बाहर ही फेंक कर आए क्या? उन्होंने शायद इसकी आशा नहीं की थी। सो कुछ क्षण के लिए तो वे सकपका गए, फिर कहा कि आपको क्या मतलब है? मैंने फिर कहा कि मेट्रो सिर्फ खास लोगों के लिए ही नहीं है, आम आदमी भी सफर करेंगे। इतने में देवी जी बोली, '' ठीक है भाई साहब, आप क्यों इतना गुस्सा कर रहे हो, आपका सामान तो चढ़ गया ना।" मैंने कहा, " मैडम, पहली बात तो मेरा सामान है ही नहीं, और दूसरी बात कि अगर मेरा सामान होता तो शायद आप बोलती भी नहीं। मैंने बगल में ही खड़े एक सज्जन की तरफ इशारा करके दिखाया कि इनके पास उस मजदूर से कहीं अधिक सामान है, आपने इनको कुछ क्यों नहीं बोला। शायद इसलिए कि ये साहब शूट बूट में हैं" इसके बाद वो सब चुप हो गए। लेकिन चंद मिनटों बाद एक तीसरे आदमी ने उन लोगों से वही कहना शुरू दिया, जिससे मैंने इस लेख की शुरुआत की है। मैंने फिर इसका जवाब देना उचित नहीं समझा, क्योंकि किसी की बकवास का जवाब देने से बात ही बढ़ती है, और फिर वह मुहावरा भी तो चरितार्थ होता दिख रहा था, खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे। साथ ही वहां खड़े अधिकतर लोगों के चेहरों पर मेरे बोलने का जो संतोष दिख रहा था, वही मेरे लिए यह जानने के लिए काफी था कि मेरा काम हो गया। साथ में मुझे एक बार फिर यह विश्वास हुआ कि ज्यादातर लोग दुनिया में अच्छे ही होते हैं।

इस घटना के बीते तो दो दिन हो गए हैं, लेकिन मेरे मन में कई सवाल उमड़ रहे हैं, जिसका जवाब मेरा खिन्न मन शायद ढूंढ पान में असमर्थ है। पहला तो ये कि क्या जैसे-जैसे आदमी आर्थिक रूप से ऊपर की ओर बढ़ता है, अपने से कमतर लोगों के प्रति असंवेदनशील हो जाता है? मैं खुद अपने अंदर झांकने की कोशिश करता हूं तो शायद बदतमीजी से जब कभी भी मैंने बात की हो, वह आर्थिक रूप से छोटे लोगों से ही की है। हालांकि मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि मुझसे ऐसा अपराध नहीं हो।

आपको नहीं लगता कि आज का समाज, शिक्षा पद्धति, जीवन दर्शन सब एक ही तरफ बढ़ रहा है, "आर्थिक उन्नति की तरफ"। लेकिन परेशान करने वाली चीज यह है कि यह उन्नति हमें असंवेदनशील क्यों बना रहा है। प्रगति संसार का नियम है, समाज हमेशा से आगे की तरफ ही बढ़ा है, लेकिन इस उन्नयन से अगर असंवेदनशीलता का जन्म हो तो फिर ऐसी प्रगित से क्या फायदा। समाज के प्रति, कर्तव्यों के प्रति, अनुशासन के प्रति, पर्यावरण के प्रति, संबंधों के प्रति और न जाने जीवन के और कितने भी पहलू जोड़ लें सबके प्रति हम संवेदनशील ही तो होते जा रहे हैं। अभी के समय में कवि की वो पंक्तियां चरितार्थ हो रही हैं जिसमें उन्होंने कहा था-

कुछ नहीं दिखता था अंधेरे में मगर, आंखें तो थीं,
ये कैसी रोशनी आई कि सब अंधे हो गए।।

90 के दशक के बाद जिस सूचना क्रांति के दौर में हम जी रहे हैं, उसमें ज्ञान का मतलब ही सिर्फ सूचना हो गई है। सूचना और ज्ञान के प्रति वह विभाजक रेखा कहीं मिट गई है। आज जो जितना सूचित है वही ज्ञानी है। जबकि जीवन दर्शन, सामाजशास्त्र जैसी चीजें जिससे हमारा जीवन संचालित होता है वह ज्ञान कहीं लुप्त हो गया है। पहले के समय में ज्ञानी उसी को समझा जाता था, जो जीवन जीने की कला, जीवन में शांति प्राप्त करने की कला और समाज को व्यवस्थित रहने की कला को सिखाता था। अब दार्शनिक, समाजशास्त्री सबको हम प्रगति के अंधी दौड़ में पागल घोषित करने में लगे हुए हैं।

आपको नहीं लगता कि इसी ज्ञान रूपी क्षेत्रों को जीवित करने की जरूरत है। ताकि लोग संवेदनशील बनें, सामाजिक बनें। अगर ऐसा हुआ तो न किसी कोपेनहेगन सम्मेलन की जरूरत होगी, न महिलाओं के प्रति हिंसा रोकने के लिए वृहद प्रचार की जरूरत होगी, न कोई अमीरजादा सड़क पर सो रहे लोगों को कुचलेगा, न आतंक के खिलाफ वैश्विक मुहिम की जरूरत होगी, न ट्रेन की जनरल बॉगी में कुछ हजार रुपये लेकर जा रहे मजदूरों से पुलिस पैसे छिनेंगी, न लुधियाना में लुटे जाने के विरोध में ट्रकों में मजदूर आग लगाएंगे। न कोई राज ठाकरे पैदा होगा। आप क्या सोचते हैं? जरा सोचिए.......और मेरी उद्विगनता भी दूर कीजिए।

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

समलैंगिकता को महिमामंडित न करें

आज दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर निकाल दिया और इसे जायज करार दिया। इस फैसले के साथ ही समलैंगी लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। हो भी क्यों नहीं आखिर उनको समाज की मुख्य धारा में आने का मौका मिला। लेकिन इस फैसले के बाद एक खास बात जो मुझे आकर्षित करती है वह यह है कि इससे लोगों में गजब का उत्साह है। वो इस पर खुश हो रहे हैं, जैसे कि यह बहुत ही जायज काम है और यह होना चाहिए।

सबसे पहली बात तो यह है कि यह एक अप्राकृतिक कार्य है इससे किसी को भी गुरेज नहीं होना चाहिए। अगर कोर्ट ने यह फैसला दिया है तो इसका मतलब सिर्फ इतना है कि जिन लोगों के साथ प्रकृति ने अन्याय किया है अब उनको भी समाज की मुख्यधारा में आने का मौका मिलेगा। इस प्रकार के बीमार लोगों को भी हक है कि उनको वो सभी स्वास्थ्य सेवा मिले जिससे वो महरूम होते आ रहे हैं। इसका कारण सिर्फ इतना था कि अभी तक यह अपराध था, जिसके कारण ये पुलिस के डर से किसी बीमारी कि स्थिति में भी डॉक्टर के पास से जाने से बचते रहते थे। इस रूप में मुझे इस कानून का स्वागत करने में कोई परेशानी नहीं है।

मुझे परेशानी इस बात से है कि चैनलों ने इतिहास पलटकर दिखाने की कोशिश की जैसे कि यह सबका जन्म सिद्ध अधिकार है और जैसे कि इसमें पूरा समाज ऐतिहासिक काल से लिप्त रहा हो। साथ ही बॉलीवुड फिल्मों का उदाहरण दिया जाने लगा जैसे कि ये फिल्में ही जिंदगी का रास्ता तय करती हों। ये ठीक है कि मनुस्मृति और कामसूत्र में इसके बारे में उल्लेख है, जिसका कि सभी चैनलों ने उल्लेख किया लेकिन साथ ही इसमें इसको अनैतिक और अप्राकृतिक भी करार दिया है, इसको चैनलों ने एडिट कर दिया। और सबसे बड़ी बात इतिहास में अगर किसी बात का जिक्र है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह सर्वमान्य है। अगर ऐसा है तो मैं एक उदाहरण देता हूं, जो तुलसीदास की रामायण में है। उन्होंने लिखा हैः-

ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी,
ये सब है तारण के अधिकारी।।

इसको भी मानिए। मेरा कहने का मतलब यह है कि इतिहास में कई अच्छी और गलत बातों का जिक्र है। उसको हमें उसी रूप में लेना चाहिए। समलैंगिकता के समर्थक लोग ये भूल जाते हैं कि आज अगर समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से निकाला गया है तो इसलिए नहीं की यह बहुत ही अच्छा है। यह सिर्फ इसलिए है कि समलैंगी लोगों में एड्स के खतरे से बचाया जा सके। धारा-377 को खत्म करने की याचिका दायर करने वाली संस्था नाज फाउंडेशन एड्स के खिलाफ लड़ने वाली एक संस्था है। मेडिकली भी यह साबित हो गया है कि अप्राकृतिक यौन संबंध में एड्स का खतरा प्राकृतिक यौन संबंध से कहीं ज्यादा होता है। इसलिए इस कानून में सुधार जरूरी है ताकि वो खुले आम समाज के सामने आ सकें और स्वास्थ्य सेवा ले सकें।

इससे अगल हट के अगर देखा जाए तो समलैंगी संबंध समाज विरोधी और अनैतिक कृत्य है। यहां तक कि भारत के सोलिसीटर जनरल पीपी मल्होत्रा ने भी कहा है कि इससे समाज में गलत संदेश जाएगा और अनैतिकता फैलेगी। ठीक है कि इससे एड्स से लड़ने में इससे सहयोग मिलेगा, लेकिन इस प्रकार के कानून से इसका फैलाव भी होगा। अब शौकिया भी लोग इस प्रकार के कृत्य में शामिल होंगे। हमेशा से ही युवा समाज को हर वो चीज करने में मजा आता है जो लीक से हटकर हो। इससे एड्स का फैलाव ही होगा।

दर्शनशास्त्र में एक अहम विषय है धर्म और नैतिकता। इसमें यह बताया गया है कि धर्म की स्थापना इसलिए हुई ताकि समाज को नैतिक रखा जा सके। हर वो नैतिक नियम जो समाज को व्यवस्थित रखने के लिए जरूरी हैं उनको धर्म का हिस्सा बना दिया गया, ताकि लोग उसको मानने के लिए बाध्य हों। अगर हम स्वतंत्रता के नाम पर इस तरह से हर नैतिक नियमों को तोड़ते रहेंगे तो शायद हमारी सभ्यता वहीं पहुंच जाएगी जहां थे।

सभ्यता के विकास के तहत अगर हम गौर करें तो हम पाते हैं कि पहले लोग जानवरों की तरह रहते थे। न कोई परिवार था न सेक्स का ही कोई नियम था। इसलिए एक ही परिवार में शादियां होती थी और लोग कबायली जीवन जीते थे। इसलिए शुरुआती समय में घर गोलाकार होते थे। सब एक साथ रहते थे। उनके लिए सेक्स कोई निजी चीज नहीं थी। धीरे-धीरे हम पाते हैं कि घर चौकोर बनने लगे और घरों में दीवार उठने लगी। अब इंसान को यह समझ में आने लगा कि कुछ चीजें निजी होती हैं। फिर एक परिवार में शादियां बंद हुईं, फिर एक गोत्र में। इस प्रकार से एक परिवार, एक कुनबा तथा फिर समाज बना। यह मडिकली भी साबित हो गया है कि अगर निकट संबंधियों में वैवाहिक संबंध हो तो जीनेटीकली दोष उत्पन्न होता है। मुस्लिम समाज में यह देखा जाता है क्योंकि अभी भी वह कबायली तरीके से बाहर नहीं निकल पाए हैं। ये सब लिखने का मेरा मतलब सिर्फ इतना है कि समाजिक नियम ऐसे ही नहीं बन गए। ठीक है कुछ गलत नियम भी बने, जिसको समय के साथ खत्म कर दिया गया। लेकिन अभी भी कई नियम ऐसे हैं जो बहुत ही जरूरी हैं।

इसलिए मेरा यह मानना है कि समाज समलैंगिकता को महिमामंडित करना बंद करे। समलैंगी लोग बीमार लोग हैं, जिनको समाज के सहयोग की जरूरत है और हाईकोर्ट का फैसला इस रूप में स्वागत योग्य है। लेकिन समाज में सामान्य लोग इसको इस रूप में न लें जैसे कि जैसे एक नई व्यवस्था शुरू हुई हो। हालांकि अगर समाज उस ओर बढ़ता है तो मुझे कोई अचंभा नहीं होगा। सभ्यता के विकास के क्रम में एक थ्योरी साईक्लिक थ्योरी भी दी गई है। जिसमें कहा गया है कि जिस तेजी से सभ्यता का विकास होता है एक समय के बाद उसी तरह उसका पतन भी होता है। ठीक उसी प्रकार जैसे पहिए का एक हिस्सा ऊपर जाकर तेजी से नीचे गिरता है।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

डार्विन का सवाल, सबका मालिक एक कैसे?

हमेशा से ही इंसान की खोजी दिमाग ने उन सब समस्याओं का समाधान ढूंढने का प्रयास किया जो परेशान करती हैं और उसमें बहुत हद तक सफल भी हुआ। यही कारण है कि मानव सभ्यता जंगल से निकल कर गांवों में और फिर शहरों तक पहुंच गई। लेकिन इन सबके बीच जिन समस्याओं को खोजने में मानव दिमाग सक्षम नहीं हुआ उसको ईश्वरीय कृपा, ईश्वर की लीला, जादू-टोना का नाम दे दिया। इन्हीं सवालों में से एक अहम सवाल है जीवन की शुरुआत कैसे हुई? हमेशा से दार्शनिकों ने इसका हल निकालने की कोशिश की। लेकिन सबका घूम-फिरकर एक ही जवाब आया कि किसी परम तत्व ने हमें बनाया है। उसी ने यह विश्व बनाया है और इसमें जीवों की रचना की है। उस परमतत्व को किसी ने ‘मोनड’ कहा, किसी ने ‘ब्रह्म’ कहा तो किसी ने ‘प्रत्यय’ कहा। लेकिन जीवन की यह धार्मिक व्याख्या एक व्यक्ति को खुश नहीं कर पाई और उसका परेशान मन निकल पड़ा इसकी खोज करने और जब वह इसकी खोज कर वापस आया तो जैसे पूरे विश्व में भूचाल आ गया, क्योंकि उन्होंने ‘सबको बनाने वाला एक है’ इसी पर सवाल उठाते हुए कहा कि जीवों का विकास वस्तुतः प्रकृति का विकासक्रम है और प्रकृति के विकास के साथ ही उससे सामंजस्य बिठाने के क्रम में कई जीव मिट गए और कई जीवों की उत्पति हुई। दुनिया को यह नवीन सिद्धांत देने वाला व्यक्ति था चाल्र्स डार्विन।

जी हां, चाल्र्स डारविन ने सबका मालिक एक है पर सवाल उठाते हुए अपनी किताब ‘ओरिजीन ऑफ स्पीसीज’(Origin Of the Speceis) में सवाल उठाते हुए `विकासवाद का सिद्धांत' (Theory Of Evolution) दिया। जिसमें उन्होंने बताया कि समय के साथ-साथ प्रकृति के साथ समन्वय करते हुए ही जीवन का विकास हुआ। 1831 में ‘बीगल’ नामक जहाज पर उन्होंने अपनी जिज्ञासा को पूरा करने के लिए 5 साल के सफर की शुरुआत की। अपनी इस सफर में वह अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, उत्तर अमेरिका, यूरोपीय देशों की यात्रा की। इन सभी जगहों की जैव विविधता को देखकर उनको आभास हुआ कि भिन्न-भिन्न प्राकृतिक स्थिति के हिसाब से ही जैव विविधता भी है। उन्होंने सवाल भी उठाया कि अगर सबका मालिक एक है तो एक ही जाति के पक्षी विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न क्यों हैं।

उन्होंने कहा कि वास्तव में हम मरने के बाद कहां जाते हैं इस पर सवाल तो उठाया जा सकता है लेकिन हम कैसे बने इस वैज्ञानिक तथ्य पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। लेकिन धर्म और आस्था के नाम पर चलने वाली लाखों दुकानों को यह कैसे गवारा होता और शुरू हुआ विरोध का एक नया अध्याय। विकासवाद के सिद्धांत का विरोध करने वालों में एक अहम नाम है हरवर्ट स्पेंसर का जिन्होंने ‘सरवाइवल ऑफ द फीटेस्ट’ का सिद्धांत देकर डार्विन का विरोध किया। जिसमें उन्होंने कहा कि प्रकृति में जो फिट है वही जी सकता है। वस्तुतः डार्विन ने यह कभी नहीं कहा था कि बंदर से बना है इंसान। उन्होंने कहा था कि बंदर, इंसान और वनमानुस के पूर्वज एक ही थी। उन्होंने प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल की बात की थी ताकि प्रकृति के साथ जीवन का एक अच्छा तालमेल बैठ सके। लेकिन औपनेवेशिक भूख को शांत करने में जुटे उस समय के सर्वाधिक यूरोपीय मुल्क को स्पेंसर की वह बात ही ज्यादा अच्छी लगी-सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट। हमारे देश में दलितों को किसी योग्य न समझने और दास प्रथा से लेकर महिलाओं की बुरी स्थिति के पीछे यही सोच काम कर रही है।

जहां डार्विन के विरोधी मौजूद हैं वहीं उनके समर्थकों की कमी नहीं है। कार्ल माक्र्स ऐसा ही एक नाम है। जिन्होंने धार्मिक मान्यताओं का खंडन करते हुए इसकी तुलना अफीम से की। जिस दासों एवं मजदूरों के शोषण के खिलाफ कार्ल माक्र्स ने झंडा बुलंद किया उन्हीं दासों की दयनीय स्थिति देखकर डार्विन का भी दिल पसीज गया था। जहां डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत दिया वहीं कार्ल माक्र्स ने सामाजिक विकास की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की। दासों के शोषण के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने भी जोरदार संघर्ष किया। यह भी एक अजीब संयोग है कि लिंकन और डार्विन एक ही दिन पैदा हुए थे।

डार्विन के सिद्धांत का विरोध और समर्थन अभी भी जारी है। धार्मिक मान्यता और विकासवाद के सिद्धांत के समर्थकों और विरोधियों के बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने दोनों ही जगह अपना स्थान बना लिया है। यह हर जगह दिख जाता है। यही कारण है कि चंद्र मिशन से पहले वैज्ञानिक नारियल फोड़ते हैं, ऑपरेशन करने से पहले डॉक्टर ईश्वर के आगे हाथ जोड़ते हैं। आपको हर अस्पताल के अंदर या उसके ठीक सामने एक पूजा स्थल जरूर मिल जाएगा। और सबसे महत्वपूर्ण यह कि यहां अल्लाह, राम, ईसू और नानक सब एक हो जाते हैं। आप इन सबको एक ही कमरे में एक दूसरे के आस पास देख सकते हैं। वास्तव में यह विज्ञान और विकास का मेल है। अब लोग धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वैज्ञानिक खोजों को भी अहमियत देते हैं। इसका कारण एक तो यह है कि विज्ञान ने लोगों के जीवन को आसान बनाया है और कई समस्याओं को दूर किया है और दूसरा लोगों के सामने अभी भी कई समस्याएं हैं जिसका उत्तर विज्ञान के पास नहीं है। वह सवाल जस का तस बना हुआ है कि हम मरने के बाद कहां जाते हैं। इस प्रश्न का उत्तर जब मिलना होगा मिल जाएगा लेकिन दुनिया के बारे में एक नवीन दृष्टि देने वाले डार्विन और उनके विकासवाद के सिद्धांत को सलाम।

शनिवार, 17 जनवरी 2009

‘स्लमडॉग...’ पर क्यों करें वाह-वाह!

स्लमडॉग मिलियनेयर को मिली सफलता पर पूरा देश झूम उठा। सबसे खुशनुमा पहलू यह है कि पहली बार किसी भारतीय संगीतकार (एआर रहमान) को गोल्डन ग्लोब पुरस्कार से नवाजा गया। लेकिन इन सबके बाद भी वह किसी को नहीं दिखा जो बिग बी अमिताभ बच्चन को दिखा। वह है भारत की स्याह छवि जो इस फिल्म में दिखाई गई है। क्या भारत सचमुच सिर्फ ऐसा ही है? क्या विदेशों में गरीबी और भूखमरी नहीं है? अगर हां तो क्यों पश्चिम को वही भारतीय चीज अच्छी लगती है जो भारत का काला पक्ष दिखाता प्रतीत होता है। वास्तव में इसपर सोचने की जरूरत है।

वास्तव में यह आज की बात नहीं है। शुरू से ही वही भारतीय फिल्में पश्चिम में सराही गई जिसमें रोता बिलखता, भ्रष्ट, एक-एक निवाले के लिए मोहताज भारत की छवि को दिखाया गया। सत्यजीत रे ने इसी मजबूर भारत को दिखाकर पश्चिम में वाहवाही लूटी। उन पर यह आरोप भी लगता है कि उन्होंने भारत की गरीबी को पश्चिम में बेचने का काम किया। अपनी कमियों को दिखाना और समझना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन उसको बेचने के लिए दूसरों को परोसना बिल्कुल ही निंदनीय है। ठीक है कि भारत में अभी कई समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं, ठीक है अभी बहुत बड़ा तबका सुविधाविहीन है, लेकिन उन्हीं के अंदर वह जोश और जज्बा भी विद्यामान है, जो शायद गरीबी को बेचने वालों को नहीं दिखता। जरूरत उसको दिखाने की है।

अगर ऐसा नहीं है तो जाइए और उन गरीब झोपड़ियों के भीतर झांकिए। अंधेर झोंपड़ी से भी आपको वह अट्टाहास सुनाई देगा जिसके लिए शायद महलों में रहने वाले भी तरसें। यह अट्टाहास कोई करुण व्यथा नहीं है, बल्कि जीवन जीने की कला है। वह जज्बा है जो यह सिखाता है कि जीवन जीने का नाम है। अमिताभ बच्चन ने सही ही कहा कि बॉलीवुड एक बहुत बड़ा बाजार है, जिसमें कई मनोरंजक फिल्में बनती हैं, लेकिन उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। उनको वही फिल्में पसंद आती हैं जिसमें भारत की स्याह छवि दिखती है। ऑस्कर में टॉप-5 में गई उन भारतीयों फिल्मों की तरफ गौर करें तो यह तस्वीर और साफ हो जाएगी। अब तक तीन भारतीय फिल्म टॉप-5 में अपना स्थान बनाने में कामयाब हुईं हैं वह है सलाम बंबई, मदर इंडिया और लगान। यह तीनों ही फिल्में मजबूर, गरीब भारत की ही छवि को दिखाती है।

अब उन साहित्यों की तरफ भी गौर करें जो अब तक विदेशों में चर्चित और पुरस्कृत हुईं हैं। अब तक मान बुकर पुरस्कार से सम्मानित भारतीय पुस्तकों में अरुंधती राय की The God Of Small Things, किरण देसाई की Inheritence Of Loss और हाल ही में अरविंद अडिगा की White Tiger। इन सब किताबों की विषयवस्तु मजबूर, भ्रष्ट, पिछड़ा भारत ही है। इन सब लेखकों ने साहित्य की दुनिया में वही किया जो फिल्मों की दुनिया में सत्यजीत रे ने किया और अगर इन्होंने ऐसा नहीं भी किया तो पश्चिम ने इनको इसलिए सराहा क्योंकि इनमें भारत को वैसा ही दिखाया गया है जैसा वो देखना चाहते हैं।

White Men's Burden की गलतफहमी से लगता है पश्चिम अभी पूरी तरह नहीं उबर पाया है। इस थ्योरी की सहायता से पश्चिम तीसरी दुनिया में अपने शोषणकारी शासन को न्यायसंगत ठहराने की कोशिश करता था, जिसमें कहा गया था कि तीसरी दुनिया के पिछड़े और बर्बर समाज को सभ्य बनाने का जिम्मा उनका है इसलिए उनका शासन जरूरी है। उनका शासन तो चला गया लेकिन अभी तक उनकी दूसरे देशों को पिछड़ा देखने की आदत गई नहीं है। हिंदी में एक बड़ी अच्छी कहावत है ‘रस्सी जल गई पर बल नहीं गया’ उनपर बिल्कुल सटीक बैठती है।

अब एक बार फिर स्लमडॉग मिलियनेयर पर आइए। यह फिल्म विकास स्वरूप के नोवेल Q & A पर आधारित है। इस किताब का मुख्य पात्र राम मोहम्मद थॉमस है। जिसको यह नाम इसलिए दिया गया क्योंकि उसके धर्म को लेकर विवाद खड़ा हो गया। इसलिए तीनों धर्मों को साथ लेते हुए उसका नाम राम मोहम्मद थॉमस रखा गया। लेकिन फिल्म में इसको बना दिया गया जमाल मलिक, जिसकी मां को हिंदू दंगाईयों ने मार दिया। आखिर क्यों? शायद इसलिए कि भारत की काली छवि दिखाकर ही पश्चिम को प्रभावित किया जा सकता था। जरूरत इसी सोच से निकलने की है।

ऐसे में यह हमारी जिम्मेवारी बनती है कि हम भारत की ऐसी छवि को दिखाना बंद करें। यह जिम्मेवारी सबसे अधिक उनलोगों की है जो अब भी बाजार को ध्यान में रखकर काम करते हैं। अब भारत बदल गया है। अब एक भारतीय (सुनील मित्तल) ब्रिटेन में जाकर प्रधानमंत्री आवास के पास एक महल खरीदने की हैसियत रखता है। अब एक भारतीय (बॉबी जिंदल) अमेरिका में जाकर सीनेटर बनने का माद्दा रखता है। भारतीय ज्ञान से तो पूरा पश्चिम स्तब्ध है, जो वहां जाकर अपनी काबिलियत का परचम लहरा रहा है। जो साहित्यकार भारत की भद्दी छवि को दिखाते हैं उनको यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जो विदेशी इमदाद और निवेश हमारे यहां हो रहे हैं वह उनकी भारत की स्याह छवि को दिखाने के कारण नहीं है, बल्कि यह भारत की खुद की बढ़ती हैसियत है। अब भारत वह भारत नहीं रहा। इसलिए फिल्मकारों को तथा साहित्यकारों को चाहिए कि वह भी अपनी सोच बदलें। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम अपनी समस्याओं को देखना बंद कर दें। हम जरूर देखें लेकिन उसको बेचें नहीं। हम उन किताबों को तरजीह दें जिसमें करुण सिसक के साथ एक मुस्कान की आस भी दिखे, काली अंधेरी रात के बाद सुहावनी सुबह भी दिखे।

यह विडंबना है कि भारत की समस्या पर लिखी पुस्तक भारत में प्रसिद्ध होने की बजाय विदेशों में प्रसिद्ध हो जाती है और अवार्ड जीतती है। यह शायद इसलिए कि वह वहीं के लिए लिखी जाती हैं। मुझे नहीं लगता कि भारत में जिन किताबों को साहित्य अकादमी पुरस्कार, सरस्वती सम्मान, व्यास सम्मान आदि से पुरस्कृत किया जाता है उनको पढ़ने की भी जहमत उठाते होंगे, कई लोग तो इन पुरस्कारों के नामों से भी वाकिफ नहीं होंगे, ऐसा क्यों है..........आप बेहतर जानते हैं।

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

जल्द ही "गांधी" हो जाएंगे "गैंधी"

मैं पिछले कुछ दिनों से एक प्रयोग कर रहा हूं। प्रयोग कुछ ऐसा कि जिससे पता चले कि हम हिन्दुस्तानी किसी की कॉपी करने में कितने उस्ताद होते हैं। पहले मैं आपको यह बता दूं कि यह प्रयोग है क्या।

मैं अपने मित्रों या जहां कहीं भी मौका मिलता है एक सवाल पूछता हूं। मैं उनसे कहता हूं कि राम ने रावण को मारा, इसको इंग्लिश में बोलो। और वे बिना एक मिनट भी लिए बोलते हैं "रावणा" किल्ड बाय "रामा" मुझे पता है कि आपमें से कई लोग सोच रहे होंगे कि इसमें गलत क्या है।

यह तकनीकी रूप से गलत तो है ही साथ ही हिन्दुस्तानियों की कॉपी करने की आदत का भी जबरदस्त उदाहरण है। क्योकि अंग्रेज राम या रावण नहीं बोल पाते इसलिए वो रामा और रावणा बोलेंगे तो हम भी ऐसा ही करेंगे। और ऐसा हो भी क्यों नहीं हमारे यहां ही तो डुप्लीकेट बनने का फैशन जो है। हमारे यहां हर लोकप्रिय शख्सियत का कोई न कोई डुप्लीकेट जरूर मिल जाता है। अब क्योंकि अंग्रेजी अपनी भाषा तो है नहीं इसलिए वो जैसा बोलते है वैसा ही बोलो, जैसा वो करते हैं वैसा ही करो। मैं यहां करने के बारे में ज्यादा नहीं लिखूंगा नहीं तो विषय से भटक जाउंगा।

इस तकनीकी खामी के साथ आम आदमी बोलें तो समझ में आता है, लेकिन हमारे भारतीय न्यूज चैनल भी कुछ ऐसा ही करते हैं। ए रिपोर्ट फ्रॉम "बरखा" को बोलेंगे ए न्यूज रिपोर्ट फ्रॉम "बारखा"। इसी तरह इंग्लिश न्यूज चैनल के लिए कसाब हो गया "कसब।

किसी नई भाषा को हम अपने सहूलियत के लिए सीखते हैं, न कि अपनी खुद की जुबान बिगाड़ने के लिए। नाम का उसी तरह से उच्चारण होना चाहिए जैसा कि वो है। इसलिए राम, राम हैं न कि रामा। इससे किसी को इनकार नहीं हो सकता कि इंग्लिश हमारी भाषा नहीं है, लेकिन आज के समाज में यह बहुत ही उपयोगी है। खासकर भारत जैसे बहुभाषी देश के लिए जहां हर तीन किमी पर बोली बदल जाती है वहां कोई ऐसी भाषा जरूर होनी चाहिए जो सब समझ सकें और सब बोल सकें। हिंदी ने इस रूप में काफी प्रगति की है लेकिन इंग्लिश के ग्लोबल होने और रोजगारोन्मुख होने से इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। यह अलग बात है कि हिन्दी को भी इस रूप में प्रचारित किया जा सकता था। आप अगर फ्रांस, इटली, जर्मनी, रुस जाएं तो आपको वहां बात करने के लिए उनकी भाषा को सीखना पड़ेगा। मेरा एक दोस्त कुछ दिनों पहले फ्रांस गया था और वह बताता है कि वहां बस एक दो न्यूज चैनल इंग्लिश में है नहीं तो सारे फ्रेंच चैनल हैं। यह होता है अपनी भाषा से लगाव।

लेकिन भारत में ऐसी आशा नहीं कि जा सकती। जब यूरोप में राष्ट्रों का एकीकरण हुआ तो इसका आधार ही या तो भाषा बनी या एक जाति। राष्ट्र की परिकल्पना ही यूरोप में इसी तरह से विकसित हुई। राष्ट्र का मतलब एक जाति, एक धर्म और एक भाषा। लेकिन भारत जैसे बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी और बहुधर्मी देश में ऐसा सोचना भी मूर्खता होगी। लेकिन कम से कम हिंदी को मिली राष्ट्रीय भाषा के दर्जे का सम्मान तो करना ही चाहिए। मेरा यह सब लिखने का यह कतई ही उद्देश्य नहीं है कि मैं इंग्लिश विरोधी हूं, इंग्लिश बोलें लेकिन हिन्दुस्तानियों की तरह। मैं हिन्दुस्तानी इसलिए भी कह रहा हूं कि दक्षिण भारतीय लोग इंग्लिश दक्षिण भारतीयों की तरह बोलें, उत्तर भारतीय, उत्तर भारतीयों की तरह न कि अमेरिकी और ब्रिटिशर्स की तरह। कम से कम जो चीज बिल्कुल ही हिन्दुस्तानी है और हिन्दुस्तानी ही उसको जानते हैं कि कैसे बोला जाए वह तो बिल्कुल भी नहीं। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीयों के लिए भी गांधी हो जाएंगे गैंधी जैसे कि गांगुली हो गए गैंगुली, बरखा हो गई बारखा, कसाब हो गया कसब, द्रविड गए द्राविड। अब आप कहिए..............

मंगलवार, 5 अगस्त 2008

अहमदाबाद विस्फोट और `पेज थ्री'

जब मधुर भंडारकर ने पेज थ्री फिल्म बनाई थी तो पेज थ्री के पेज की शोभा बढ़ाने वाले लोगों ने उसमें दिखाए गए कुछ चीजों पर आपत्ति की थी और कहा था कि ऊंची सोसोयटी इतनी भी संवेदना शून्य नहीं है। लेकिन अहमदाबाद विस्फोट ने पेज थ्री को वास्तविकता में ही चरितार्थ कर दिया। हालांकि ऐसा पहले भी होता होगा लेकिन इस ताजा घटनाक्रम ने फिर से यह साबित कर दिया कि संवेदनशून्यता किस हद तक ऊंची सोसायटी को घर करती जा रही है।

अहमदाबाद में बम विस्फोट की एक जगह पर जहां मृतकों के शव को उठाने और घायलों को अस्पताल पहुंचाने की अफरा-तफरी मची थी, वहां से बस कुछ कदम की दूरी पर एक होटल में लोग मुर्गा तोड़ने में मशगूल थे। इतना ही नहीं वे वीडियो फुटेज को देखकर ऐसे कर रहे थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। यह सब अहमदाबाद से दूर दिल्ली या किसी और शहर में होता तो कोई बात नहीं थी। गुजरात के ही किसी शहर में अगर यह सब हुआ होता तो क्षम्य था, लेकिन यह सब हुआ ऐसी जगह जो घटनास्थल से बस कुछ कदम की दूरी पर था।

मैं नहीं कहता कि सबकुछ छोड़कर इंसान को दुख मनाने में लग जाना चाहिए, इससे तो जीवन में ठहराव आ जाएगा, और जीवन तो चलने का नाम है। लेकिन ऐसी वीभत्स घटना के समय भी इस प्रकार का व्यवहार निश्चित ही संवेदनशून्यता को दरसाता है।

एक दूसरी घटना पर भी गौर फरमाइए। इसको तो आप सबने टीवी पर जरूर सुना होगा कि कैसे विस्फोट की खबर सुनकर दो युवक घायलों को मदद करने भागे। घायलों को अस्पताल भी पहुंचाया, लेकिन अस्पताल में हुए धमाकों में उन दोनों युवकों की मृत्यु हो गई। दोनों ही अपने माता-पिता के इकलौती संतान थे। एक ही समय यह तो प्रकार का व्यवहार का क्या कारण है। आखिर हैं तो हम सब इंसान ही। वस्तुतः यह वर्गीय चेतना है औऱ कुछ नहीं। मदद के लिए वही दौड़ते हैं जिनको लगता है कि मरने वाले उन्हीं में से एक हैं। यह दोनों युवक इसलिए दौड़कर गए क्योंकि घायलों और मृतकों में कहीं न कहीं उन्हें अपना ही परिवार दिखा। जबकि होटल में बैठकर शाही खाना खाने वाले जबकि बाहर लाशें बिछीं हों उनको ऐसा कुछ भी नहीं दिखा जिससे उन्हें जुड़ाव महसूस हो सके।

यह बड़ी ही अजीब बात है कि आखिर जब भी संवेदनशून्यता की बात आती है तो ऊंच वर्ग ही कटघरे में क्यों खड़े होते हैं। वस्तुतः यह शायद ऊंचे इसलिए हैं क्योंकि ये संवेदनशून्य हैं। आगे बढ़ने के लिए संवेदनहीनता की ही जरूरत होती है। कईयों का शोषण कर तथा प्रोफेशनलिज्म के आधार पर दूसरे को यूज कर ही वे ऊंचे उठे हैं।

वस्तुतः यह वर्गीय चेतना ही है जिसके आधार पर यह व्यवहार करते हैं। साम्यवाद के प्रवर्तक कार्ल माक्स ने कहा था कि हमेशा से ही समाज दो वर्गों में बंटा रहा है। पहले मालिक-दास, उसके बाद भूमिपति-भूमिहीन उसके बाद पूंजीपति-श्रमिक। भारतीय समाज तो इससे एक कदम आगे जाति के आधार पर विभाजित हुआ। समय-समय पर यही वर्गीय विभाजन इस तरह की चीजों में परिलक्षित हो जाता है। लेकिन जब देश की बात आए, इंसानी मूल्यों की बात आए, इंसानी जानों की बात आए तो इस वर्गीय चेतना से ऊपर उठकर सोचना चाहिए। श्रीमदभगवतगीता में कहा गया है कि इंसान मूलतः एक शुद्ध प्राणी है, लेकिन इनलोगों को देखकर तो लगता है कि इसपर से भी भरोसा उठाना पड़ेगा।

रविवार, 27 जुलाई 2008

कैसे भूलें वह मंजर

जब-जब सीरियल ब्लास्ट होते हैं तो लोग मारे जाते हैं, सरकार जांच करवाने में जुट जाती है, मरने वालों और घायलों के लिए मआवजा घोषित किया जाता है और कुछ दिनों में सबकुछ समान हो जाता है। लेकिन इन आतंकी हमलों में जो मानवीय संवेदनाएं टूटती हैं, उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाती।

प्रत्येक हमले में कई ऐसे वाकये सामने आते हैं, जिसको सुनकर दिल दहल जाता है। अहमदाबाद में हुए आतंकी हमले का ही उदाहरण ले लें। अस्पताल में एक बच्च जीवन और मौत से जूझ रहा है और अपनी मम्मी को ढूंढ रहा है। लेकिन उसको पुचकारने और चुप कराने के लिए उसकी मां और पिता में से कोई नहीं है। उसके माता-पिता दोनों धमाकों में मारे गए हैं। उसका एक बड़ा भाई है, वह भी धमाकों के कारण बुरी तरह से घायल अस्पताल में ही पड़ा है। उसी तरह एक बूढ़े पिता के दिल का दर्द सुने। उसका जवान बेटा धमाकों में मारा गया है। लेकिन उनमें इतनी हिम्मत नहीं है कि वह अपने बेटे की लाश को जाकर ले आएं। जब उनसे पूछा गया कि उनका बेटा कहां है, तो बस वह फूट-फूटकर रो पड़ते हैं।

मन को दहला देने वाले कई ऐसी घटनाएं हैं, जिसके बारे में बस कहा और लिखा ही जा सकता है। सीमा पर लड़ने वाले जवानों को दो पता होता है कि हमला किधर से होगा। उनके पास लड़ने के लिए हथियार भी होता है। लेकिन इन आम इसानों को क्या, जिनको न तो पता होता है कि हमला किधर से होगा और न ही उनको पता होता है कि उन्हें लड़ना किससे है। बिना लड़े ही देश के दुश्मनों के हाथों शहीद हुए इन जांबाजों को सलाम।

सोमवार, 7 जुलाई 2008

अब मां-बाप की भी आउटसोर्सिंग

पहले नौकरियां, उसके बाद स्वास्थ्य सेवा, जिसके तहत हजारों की संख्या में ब्रिटेन के लोग भारत आकर इलाज कराना ज्यादा बेहतर समझते हैं। और अब बारी है मां-बाप के आउटसोर्सिग की। इन सब का कारण एक ही है पैसे की बचत।

हाल ही में एक ब्रिटेन के परिवार ने अपने माता-पिता को गोवा के एक वृद्धा आश्रम में भेज दिया, क्योंकि यहां पर उनकी देख-रेख में आने वाला खर्च ब्रिटेन में आने वाले खर्च के काफी कम है। इसी तरह न्यूयार्क के एक परिवार ने जो पिछले तीन साल से अपने माता-पिता की देखरेख वहीं न्यूयार्क में कर रहे थे, अब पैसे का बोझ कम करने के लिए उन्हें भारत स्थांनांतरित करने का फैसला किया है। इन जैसे ही पता नहीं कितने ही लोग अपने मां-बाप को ढ़लती उम्र में देश निकाला देने की तैयारी कर रहे हैं।

जनरल मेडिकल काउंसिल के अध्यक्ष शिव पांडे कहते हैं कि यह कोई नई बात नहीं है। ब्रिटेन में रहने वाले अधिकतर भारतीय वृद्धावस्था में रिटायरमेंट के बाद भारत ही आकर रहना पसंद करते हैं। लेकिन इन दोनों ही बातों में एक अंतर है। जो भारतीय विदेश गए हैं, उनका उद्देश्य बाहर जाकर पैसे कमाना होता है, इसलिए जब पैसे कमाने के मौके खत्म हो जाते हैं तो वे अपने देश ही आकर रहना पसंद करते हैं। कई भारतीय तो 10 या 20 सालों में ही अपने देश आ जाते हैं।

लेकिन वे विदेशी लोग जो अपने मां-बाप को बाहर भेजना चाहते हैं उनका मात्र उद्देश्य पैसा बचाना ही है। कोई भी मां-बाप अपना अंतिम समय अपने बच्चों के साथ रहकर गुजारना चाहते हैं। उनके अपने बच्चे अपने साथ रखना तो छोड़िए वे तो उन्हें उनके देश से ही बाहर निकाल रहे हैं।

हो भी क्यों नहीं आज के पूंजीवादी समाज में जहां हर संबंध पैसे पर तय होते हैं, वहां किसी के प्रति मानवीय संवेदना की आशा करना ही व्यर्थ है। जरूरत पूरी, संबंध खत्म। अब मां-बाप के साथ भी लोग फायदे और नुकसान को देखते हुए संबंधों को रखने लगे हैं। यही तो है आज का प्रोफेशनलिज्म।

अपने भी देश में स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है। आए दिन खबर आती रहती है कि बेटों ने मां-बाप को घर से निकाला। अगर घर से नहीं भी निकाला तो उनकी स्थिति अपने ही घर में बड़ी ही दयनीय हो जाती है। भारत में भी लोगों में अकेले रहने की प्रवृति बढ़ी है। यही कारण है कि यहां भी वृद्धाश्रमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अगर आने वाले दिनों में भारतीय भी अपने मां-बाप को नेपाल या कोई अन्य गरीब अफ्रीकी देशों में आउटसोर्स कर दें तो हैरान मत होईएगा।

इस मौके पर तो मुझे निदा फाजली की कुछ लाइनें याद आ रही हैं जो उन्होंने `मां' नामक कविता में लिखी थी -
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन,
थोड़ी-थोड़ी सी सब में,
दिन भर एक रस्सी के ऊपर,
चलती नटनी जैसी मां।
बांट के अपना चेहरा माथा,
आंखें जाने कहां गई,
फटे-पुराने एक एलबम में,
चंचल लड़की जैसी मां।

शनिवार, 5 जुलाई 2008

विदेश नीति से तय होती घरेलू राजनीति

देश में मंहगाई आसमान छू रही है, जिसको लेकर ज्यादा चर्चा नहीं है। अगर चर्चा का कोई मुद्दा है तो अभी है अमेरिका के साथ परमाणु करार। इसको लेकर जो बवाल पिछले कुछ दिनों से खड़ा हुआ है, वह और अधिक बढ़ता नजर आ रहा है।

इससे न सिर्फ सरकार के भाग्य को लेकर सवाल खड़ा हो गया है बल्कि आने वाले चुनावों को देखते हुए पार्टियों के बीच गठजोड़ भी शुरू हो गया है।

एक तरफ जहां कांग्रेसकी विरोधी समाजवादी पार्टी आने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस के साथ आती दिख रही है। वहीं दूसरी तरफ यूनाइटेड नेशनल प्रोग्रेसिवएलाइंस (यूएनएपी) ने यह साफ कर दिया है कि अगर समाजवादी पार्टी करार का समर्थन करती है तो उसके लिए यूएनएपी में कोई जगह नहीं है, हालांकि समाजवादी पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि वह परमाणु करार मुद्दे पर सरकार के साथ है।

इस राजनीतिक खेमेबंदी के बीच भारतीय जनता पार्टी ने भी यूएनएपी को अपने करीब लाने का प्रयास तेज कर दिया है। भाजपा नेता जसवंत सिंह ने कहा कि उनकी पार्टी ने यूएनपीए को केंद्र में सरकार बनाने के लिए कहा था। भाजपा ने बहुजन समाज पार्टी से भी नजदीकी बढ़ानी शुरू कर दी है।

वाम दलों का भी परमाणु करार पर इतने तीखे विरोध का कारण उसका अपना वोट बैंक ही है। वाम दलों की नीति हमेशा से ही अमेरिका विरोधी रहा है। डील मुद्दे पर वह सरकार का साथ देकर किसी सैद्धांतिक उलझव में नहीं पड़ना चाहता। आने वाले चुनावों में वह ऐसे सैद्धांतिक उलझव के साथ कतई नहीं जाना चाहेगा, जिसका वह हमेशा से विरोध करता रहा है।

जिस परमाणु करार के विरोधी इसकी मौत का फरमान लिखने के लिए बेताब था वह फिर से पुनर्जीवित होता दिख रहा है,साथ ही यह घरेलू राजनीति को भी तय कर रहा है। समस्त पार्टी इसी को केंद्र में रखकर अपना समीकरण बिठाने में लग गए हैं।

शनिवार, 28 जून 2008

हंगामा है क्यों बरपा........

जम्मू कश्मीर में श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को हस्तांतरित जमीन को लेकर उपजा विवाद आखिरकार गुलाम नबी सरकार की गले की फांस बन ही गया। कांग्रेस की समर्थक पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। हालांकि सरकार के वैसे भी कुछ ही महीने बचे थे, लेकिन जिस मुद्दे पर समर्थन वापसी की घोषणा हुई है वह न तो जम्मू-कश्मीर के लिए हित में है और न ही देश हित में। क्योंकि ऐसे कदमों से समाज बंटेगा ही। लोगों में सांप्रदायिक भावना भड़काकर राजनीतिक लाभ लेने से आने वाले समय में जम्मू कश्मीर को और भी बुरे दिन देखने को मिल सकते हैं।

मामला यह है कि श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जंगल की भूमि प्रदान की गई, जिसका प्रयोग अमरनाथ यात्रा के समय बेस कैंप के रुप में होना था। बोर्ड को वहां कोई स्थाई निर्माण की इजाजत नहीं थी। इस मामले का विरोध इस आधार पर शुरू हुआ कि इससे राज्य का जनांकिकीय संतुलन (Demographic Balance) बिगड़ जाएगा। इस विरोध का दूसरा आधार पर्यावरणीय है।

सबसे पहली बात तो ये कि इस अस्थाई बेस कैंप से जम्मू कश्मीर के जनांकीकिय संतुलन पर कैसे प्रभाव पड़ेगा। और अगर पड़ता भी हो तो क्या जम्मू-कश्मीर सिर्फ मुसलमानों का है। एक तरफ तो लाखों की संख्या में कश्मीरी हिन्दु राज्य के बाहर रहने को विवश हैं, दूसरी तरफ वहां की कौम का यह रवैया। तो किस मुंह से सरकार या वहां के लीडरान कहते हैं कि कश्मीरी हिन्दु कश्मीर आकर बसें। जब एक अस्थाई बेस कैंप पर इतना बवाल होगा तो कैसे वे लोग हिन्दुओं के स्थाई निवास को सहन कर पाएंगे।

इस मामले में जो सबसे बुरी बात हुई है वह है इस प्रकार के आंदोलनों को राजनीतिक समर्थन। ऐसा करके ये पार्टियां दो समुदायों के बीच सांप्रदायिक दूरी को बढा ही रहे हैं, जो कतई देश हित में नहीं है। किसी मुद्दे पर आम लोग आम व्यवहार करते ही हैं, लेकिन समाज के प्रबुद्ध वर्ग की यह जिम्मेवारी बनती है कि वे हमेशा सही बात कहते रहें, उससे परहेज न करें। अपने क्षुद्र राजनीतिक फायदे के लिए इस प्रकार का व्यवहार घातक है।

मैने अभी हाल ही में एक किताब पढ़ी `India : After Ayodhya' । इस किताब की कुछ बातों ने मुझे प्रभावित किया। इसमें लेखक ने लिखा है कि आज तक के इतिहास में अगर एक जाति ने दूसरी जाति पर जुल्म ढाया है तो बाद की पीढ़ि ने इसके लिए दूसरी जाति से माफी मांगी है। एकमात्र मुसलमान ही ऐसी जाति है जो अपने किए पर कभी शर्मिंदा नहीं हुई। जर्मन जाति ने यहूदियों पर जुल्म ढाया, ब्रिटन ने रेड इंडियन्स पर जुल्म ढाया और अमेरिका से लगभग उन्हें समाप्त ही कर दिया। लेकिन इस सब जातियों की बाद की पीढियों ने अपने पूर्वजों के इस कृत्य के लिए माफी मांगी। हालांकि इसके लिए आज की पीढि बिल्कुल भी जिम्मेवार नहीं थी।

अब मुसलमानों पर आइए। मध्यकाल में जब इस धर्म का प्रसार हो रहा था तो मुसलमान जाति ने कई जातियों पर जुल्म ढाए और उन्हे मुसलमान बनाया। इस बात से किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि इस्लाम का प्रसार ही खून खराबे से हुआ है, यही जेहाद है अर्थात धर्म युद्ध। भारत में भी मुसलमान आए और बड़े पैमाने पर नरसंहार हुए। आप कह सकते हैं कि ये सभी युद्ध राजनीतिक युद्ध थे। मैं भी इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते यह जानता हूं कि ये युद्ध राजनीतिक थे। लेकिन कई ऐसे आक्रमणकारी भी आए जिनका उद्देश्य सिर्फ लूटपाट करना ही था। चाहे वह महमूद गजनवी हो या फिर तैमूर। लेकिन इसके लिए भी मुसलमान समाज ने कभी भी माफी नहीं मांगी।

आप सोंच रहे होंगे कि मैं एक सांप्रदायिक व्यक्ति हूं। लेकिन यकीन मानिए, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया था तो मैंने खुद अपने कॉलेज में `War, Terrorism and Jihad' पर एक सेमिनार करवाया था। उस वक्त दिल्ली में वार तथा जिहाद को लेकर पोस्टरबाजी करने पर दिल्ली पुलिस की तरफ से रोक लगी हुई थी, लेकिन उस समय भी हमने यह कर दिखाया था। कुछ पुलिस वालों से तू-तू, मैं-मैं भी हुई। मैं यह सब सिर्फ इसलिए लिख रहा हूं कि आप इस पर एक बार सोंचे और अपनी बात कहें। मुस्लिम समाज कि इस असहनशीलता का विरोध करना ही चाहिए। जिस प्रकार हिन्दुओं को समझने की जरूरत है कि मुसलमान भी इस देश के निवासी हैं हमारे भाई हैं, यह बात मुसलमानों को भी समझनी पड़ेगी कि हिन्दु उनके भाई हैं। अगर वे इस प्रकार की असहनशीलता दिखाएंगे तो देश का भला कतई नहीं होगा।

शनिवार, 21 जून 2008

फर्क तो पड़ता है.....

मैं पिछले कई महीनों से कुछ चीजों को देखकर बहुत परेशान हो जाता हूं, इसलिए सोचा कि आपलोगों से शेयर कर लूं। एक तो शाम को जब मैं कनाट प्लेस से आफिस से घर जाता हूं तो एक तो सबवे में कई कबाड़ी लोग बैठे रहते हैं और वे सब कोकीन लेते रहते हैं। थोड़ा और आगे बढ़े तो पंचकुईंयां रोड के पास जो मेट्रो लाइन है वहां दर्जनों लोग बैठे रहते हैं और सभी सामूहिक रूप से कोकीन लेते रहते हैं, जिसमें कई महिलाएं भी शामिल होती हैं।

अब ये तो माना जा नहीं सकता कि पुलिस को या मीडिया को इसकी खबर नहीं है। लेकिन इसके बावजूद खुल्लमखुल्ला लोग कोकीन लेते रहते हैं। लेकिन मैं यहां कोई कानूनी मामला नहीं उठाना चाहता। मैं इसमें मानवीय पहलू को उठाना चाहता हूं। ये लोग जो ये सब करते रहते हैं समाज के बिल्कुल निचले तबके से आते हैं। छोटा मोटा काम करते हैं और इतना भी नहीं कमा पाते कि अपने परिवार के लिए दो टाइम के खाने का बंदोबस्त कर पाएं। लेकिन फिर भी नशा करने के लिए इनके पास पैसा आ जाता है। आप कह सकते हैं कि इन लोगों को जीने का सलीका ही नहीं आता। इसलिए ये लोग हमेशा गरीब ही रह जाएंगे।

लेकिन आप सोचिए वह आदमी जिसने दिन भर कमरतोड़ मेहनत की है और जिसे भर पेट खाना भी न मिले और अगले दिन फिर उसे काम करना हो तो वो क्या करे। शायद बो अगर नशा न करे तो शायद वह सो भी नहीं पाएगा, तो वह काम क्या करेगा खाक। आप ये मत सोचिएगा कि मैं इनके नशा करने को सही कह रहा हूं बस देखने का नजरिया बता रहा हूं। इससे शायद इन मजबूर लोगों को देखकर आपको घृणा नहीं संवेदना होगी और आप यह नहीं कहेंगे क्या फर्क पड़ता है। वास्तव में मेरा मानना है कि समाज के लिए सबसे खतरनाक यही लोग होते हैं, जो कहते हैं क्या फर्क पड़ता है, सब चलता है, ऐसे लोग वो होते हैं जिन्हें सही गलत के बारे में पता तो होता है लेकिन उसे वह स्वीकार नहीं करना चाहते, क्योंकि इससे उनको खुद अपने जीने का सलीका ठीक करना पड़ेगा। खैर इसको छोड़िए....।

वास्तव में इस तबके के लोगों की परेशानी यह है कि नगरीकरण के दौर में काम की तलाश में ये लोग शहर आ गए। गांव में काम है नहीं। लेकिन ये यहां आकर अंतहीन दुख में ही फंस जाते हैं। मेरी एक आदत है कि मैं गरीब लोगों से बात करने की कोशिश करता हूं। मैं एक बार एक रिक्शे वाले से बात कर रहा था कि वह कितना कमा लेता है। इसका भी हिसाब सुन ही लीजिए। वह दिन में औसतन 100 रुपये कमाता है, जिसमें से 30 रुपये रिक्शे का किराया। बचे 70 रुपये इसमें से कमरे का किराया प्रतिदिन के हिसाब से 20 रुपये। बचे 50 जिसमें से दो टाइम का खाना। कितना भी सस्ता खाना लगाएं तो दो टाइम का खाना 30 रुपये से कम नहीं होगा। बचे 20 रुपये। इस बीस रुपये में चलाना होता है उसे अपना पूरा परिवार। उसमें भी अगर वो एक दिन भी बीमार पड़ गया तो सोचिए क्या होता होगा। इनके लिए तो बीमार पड़ना भी अपराध है। फिर आप कहेंगे कि लोग अपने बच्चों को कैसे काम पर भेज देते हैं। इनको स्कूल क्यों नहीं भेजते। सरकार ने जब काम के बदले अनाज तथा स्कूलों में मिड डे मील स्कीम शुरू किया तो कई लोगों ने इसका बहुत विरोध किया। अभी भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इसकी आलोचना करने से बाज नहीं आते और कहते हैं कि बच्चे खाना लेकर चले जाते हैं। लेकिन सरकार बखूबी जानती है कि इसका क्या फायदा है। विवेकानंद ने कहा था कि भूखे आदमी से धर्म तथा समाज सुधार की बात करना अपराध है। हमलोग बस यही आशा कर सकते हैं सरकार की ये स्कीमें सफल हों।

मैं जब कालेज में था तो मेरी एक प्रोफेसर थीं शहाना मैडम। वास्तव में उन्होंने मेरी जिंदगी को बहुत ज्यादा प्रभावित किया। वो एक टूटे हुए स्कूटर पर आतीं थीं और मुझे अब भी पूरा विश्वास है कि उनका स्कूटर नहीं छूटा होगा। वो कहा करतीं थी की सुजीत आदमी को कितने पैसे की जरूरत होती है, मेरे तो पैसे बच जाते हैं। खैर, उनके बारे में बताना शुरू करुंगा तो मुद्दा कहीं छूट जाएगा। उनका अपना एक एनजीओ है `परिवर्तन'। मैंने भी अपने कॉलेज लाइफ में इसके लिए काम किया था। इस एनजीओ के ऐसे तो बहुत काम थे लेकिन एक काम यह भी था कि छोटे-मोटे अपराध के चलते जुर्माना न भर पाने के कारण कई लोग जो जेल में बंद होते थे उनको बाहर निकालना। कई बार मैं भी उनके साथ तिहाड़ जैल गया था और सजा भुगत रहे आदमी के परिवार से भी मिला। सच बता रहा हूं अगर जज को उस परिवार को दिखा दिया जाए तो शायद वह भी सजा देने से पहले हजार बार सोंचेगा। लेकिन किसी भी मजबूर इंसान की मदद कर जो सुकून मिलता है वो मुझे कॉलेज से निकलने के बाद आज तक नहीं मिला।

जिसका पेट भूखा है उससे अच्छे बुरे की बात करना भी अपराध है। कहा भी जाता है कि अच्छा और बुरा समाज के सबसे ऊपर और सबसे नीचे तबके के लिए नहीं बना। क्योंकि सबसे नीचे तबके के लोग इसकी परवाह नहीं करते और सबसे ऊपर तबके के लोगों को अच्छे बुरे के लफड़े में पड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। इसलिए नशा और अपराध की सबसे ज्यादा घटना निचले और ऊपरी तबके के लोगों के द्वारा ही अंजाम दिया जाता है। क्या अच्छा है, क्या बुरा है, यह सब चीजें मध्यमवर्ग के लिए है और शायद यही वह चीज है जिसपर वो गर्व करके अपने आपको तसल्ली देते हैं।

बुधवार, 18 जून 2008

आईपीएल के सीजन में फुटबॉल

भारत जैसे देश में जहां खेल का मतलब क्रिकेट, क्रिकेट और क्रिकेट तक ही सिमट कर रह जाता है ऐसे में अन्य खेलों की दुर्दशा पर अफसोस जाहिर करने के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता। हाल ही में संतोष ट्राफी का ही उदाहरण ले लीजिए। पहले तो इस आयोजन को करने में ही परेशानी हो रही थी। जैसे-तैसे इंतजाम के बाद इसका आयोजन तो हुआ लेकिन खिलाड़ियों की दुर्दशा के बारे में अगर आप जानेंगे तो आप स्वतः ही समझ जाएंगे कि उनके लिए खेलना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

इस आयोजन के लिए खिलाड़ियों को जो दैनिक भत्ता आल इंडिया फेडरेशन की तरफ से दिया गया वह महज 400 रुपये प्रतिदिन था। जिसमें खाना और रहना सभी शामिल था। इसके ऊपर 100 रुपये का पॉकेट मनी स्टेट एसोसिएशन की तरफ से दिया गया।

अब इस आधार पर देखिए कुछ टीमों की स्थिति। कर्नाटक की टीम जो कि जम्मू-कश्मीर में डल झील के पास सलीम गेस्ट हाउस में रुकी, उसका किराया 1000 रुपये प्रतिदिन था। एक रुम में चार-चार खिलाड़ी रुके जिसमें टीम के हर खिलाड़ी का 250 रुपया रहने में ही गया। उसके बाद खाना और अन्य जरुरतें अलग। इसके साथ-साथ अगर लांड्री का प्रयोग करना हो तो उसके लिए अलग से भुगतान करना पड़ता था। जाहिर है खिलाड़ियों ने खुद ही अपने कपड़े धोने का विकल्प चुना।

अब केरल की टीम का दुखड़ा सुनिए। केरल की टीम ताज होटल में रुकी। वहां किराये के अलावा सिर्फ लंच ही मुफ्त मिलता था। इसके अलावा नाश्ता और डिनर अपने पैसे से करने की खिलाड़ी सोंचने की स्थिति में ही नहीं थे। क्योंकि ताज का डिनर 400 रुपये प्रतिदिन के पैसे के हिसाब वाले व्यक्ति के लिए सोंचना भी जुर्म है।

अब इन खिलाड़ियों के सफर के बारे में भी जान ही लीजिए। केरल और कर्नाटक की टीम को जम्मू पहुंचने में ही तीन दिन लग गए। आप समझ सकते हैं दक्षिण भारत के एक छोर से उत्तर भारत के दूसरे छोर तक ट्रेन से जाने में कितना समय लगेगा। तीन दिन में जम्मू पहुंचने के बाद फिर उन्हें 12 घंटे का बस का सफर करना पड़ा। वहां से भी उन्हें हवाई सेवा मुहैया नहीं करवाई गई। जबकि फेडरेशन अगर चाहता तो इससे बेहतर बंदोबस्त किया जा सकता था।

यह हालत तो तब है जब एक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के लिए ये खिलाड़ी शिरकत करने जा रहे थे। सोंचिए इनको बाकी दिनों में कैसी सुविधा दी जाती होगी। यह हालत सिर्फ फुटबॉल की ही नहीं है, यह हालत हॉकी समेत सभी खेलों की है। ऐसी स्थिति में भी किसी प्रतियोगिता के दौरान हमें अपनी टीम से विश्व स्तर का प्रदर्शन चाहिए। उस वक्त हमें यह याद नहीं आता कि बिना किसी सुविधा के ये खिलाड़ी सिर्फ जज्बातों की ताकत से ही हर तरह से संपन्न विदेशी टीमों से लड़ते हैं, और जब लड़ते हुए परास्त होते हैं तो पूरा देश उनकी आलोचना में खड़ा हो जाता है। कोई यह नहीं सोंचता कि आखिर उनकी यह हालत क्यों है।

पिछले दिनों हॉकी को लेकर बड़ा बवाल हो गया। हॉकी फेडरेशन के उस समय के अध्यक्ष केपीएस गिल को भी हटना पड़ा। उनको हटना ही चाहिए था। मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि यह समस्या का निदान नहीं है। हमें अपने खिलाड़ियों के लिए बेहतर व्यवस्था करनी होगी। बेहतर कोचिंग फैसीलिटी, बेहतर इंतजाम तथा बेहतर भत्ता। ताकि किसी खिलाड़ी को अपना ओलंपिक मैडल न बेचना पड़े।

पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि हॉकी क्रिकेट से अधिक महत्वपूर्ण है। लेकिन यह कह भर देने से नहीं होता। बेहतरी के लिए कदम उठाना होगा। क्रिकेट ने जो मुकाम हासिल किया है वो उसने अपने प्रदर्शन की बदौलत हासिल किया है। एक आटोनोमस बाडी के रूप में बीसीसीआई ने इतना प्रोफेशनलिज्म अपने काम में लाया, उसी का नतीजा है कि आज क्रिकेट ने यह मुकाम हासिल किया है।

अगर देश में अन्य खेलों को भी बढ़ावा देना है तो इसके लिए बयान की बजाय सरकार को चाहिए कि वह अन्य खेलों की नीतियों में व्यापक सुधार करे। अन्य खेल फेडरेशन के कामकाज में ट्रांसपैरेन्सी लाए। ऐसा न हो कि एक ही व्यक्ति किसी फेडरेशन का अध्यक्ष वर्षों से बना रहे।

इस वक्त मुझे कुछ लाइनें याद आ रही हैं जो मेरे कॉलेज की एक लड़की ने लिखा था -

रख तू राह पर दो-चार ही कदम मगर जरा तबीयत से,
कि मंजिल खुद-ब-खुद तेरे पास चलकर आएगी।
ऐ हालात का रोना रोने वालों,
मत भूल कि तेरी तदबीर ही तेरी तकदीर बदल पाएगी।।

सोमवार, 16 जून 2008

वाह री मीडिया



जैसा कि आप देख रहे हैं। इस नरकंकाल को देखकर आप स्वतः ही अनुमान लगा सकते हैं कि यह कितना बड़ा कंकाल होगा। खबर के अनुसार दक्षिण भारत में सेना क्षेत्र में यह कंकाल मिला है। कल एक टीवी चैनल ने इसको बहुत देर तक दिखाया भी और कहा की यह महाभारत में वर्णित भीम का पुत्र घटोत्कच्छ का कंकाल है।



मैं आपका ध्यान कुछ चीजों की ओर आकर्षित करना चाहता हूं-

1. यह इमेज `वर्थ 1000' से उठाया गया है। इस साइट पर अलग अलग तरह के डिजिटल फोटो को अप इडिट करके अपलोड कर सकते हैं। इस इमेज को वहीं से उठाया गया है।


2. जैसा की खबर में कहा गया है कि इसकी खोज नेशनल ज्योग्राफी की टीम ने आर्मी एरिया में किया है लेकिन अब तक न तो आर्मी ने और न ही नेशनल ज्योग्राफी की टीम ने कुछ आधिकारिक बयान दिया है।

3. मानव आकृति के हिसाब से यह मानने योग्य है ही नहीं। ऐसा इसलिए कि मानव के इतना अधिक समझदार जीव बनने के पीछे एक प्रमुख कारण उसका आकार भी है। बड़े आकार के जीवों की मस्तिष्क क्षमता इतनी बढ़ ही नहीं सकती जितनी की मानव की है।




देखिए कुछ डिजिटल फोटो का नजारा-


1.




एक आंख वाला इंसान, देखा है कभी आपने। अगर टीवी चैनल इसी को एक न्यूज बनाकर आपको कल दिखा दें तो हैरान मत होइएगा।
2.



एक नजारा यह भी देखिए। छोटे से गोलाकार आकृति में बच्चा। कल को इसे लिलिपुट से मिला अवशेष बताया जा सकता है।

मीडीया पर सवालः

सवाल यह उठता है कि आखिर मीडिया किस ओर जा रहा है। टीआरपी रेटिंग के पीछे दौड़ता मीडिया शायद भूल गया है कि उसकी समाज के प्रति भी कुछ जिम्मेवारी है। न्यूज के नाम पर लोगों के सामने अंधविश्वास, जादू टोना, मानवता को छिन्न-भिन्न करने वाले ऐसी खबरों को दिखाकर मीडिया क्या दिखाना चाहता है।

कब तक मीडिया टीआरपी के लिए लोगों को बरगलाती रहेगी। अपना एक स्टैडर्ड तो सेट करना ही चाहिए। अगर नहीं तो ऐसा कहने का कोई हक नहीं कि मीडिया समाज ऐसा बुद्धिजीवी समाज है जो समाज को आइना दिखाता है। मुझे तो लगता है कि आज की मीडिया आइना नहीं अपने मतलब का चश्मा लोगों को पहनाता है। यह भारतीय संस्कृति रही है कि हम बहुत अधिक विश्वास करते हैं, लेकिन जब विश्वास टूटता है तो फिर किसी पर विश्वास नहीं करते। मीडिया को ध्यान रखना चाहिए कि कहीं लोगों का विश्वास ही न उठ जाए। इसलिए मीडिया भालू आया.....भालू आया...करना छोड़े।

शनिवार, 14 जून 2008

रानी को नहीं पता कहां है राजघाट

हाय रे बॉलीवुड, पैसे की चमक-दमक और पश्चिमी सभ्यता के चकाचौंध में हमारे बॉलीबुड के सितारे इतनी खो गए हैं कि उन्हें यह तक पता नहीं कि कहां है बापू का समाधि स्थल राजघाट। जी हा शाहरुख खान की पांचवीं पास में आए सफलतम अभिनेत्रियों में मानी जाने वाली रानी मुखर्जी से जब पूछा गया कि राजघाट कहां है तो वह बगलें झांकतीं नजर आईं। उनके साथ आए करण जौहर ने तो कहा कि उन्होंने मधुर भडारकर की फिल्म में देखा था, शायद यह नई दिल्ली में है। आपको लग सकता है कि यह बहुत ही साधारण बात है। आप सोंच रहे होंगे कि हो सकता है कि जेनरल नॉलेज कमजोर हो। लेकिन अगर ऐसा है तो उन्हे यह भी पता नहीं होना चाहिए कि एफिल टॉवर कहां है। लेकिन ऐसा नहीं होगा।

आज फिल्मी दुनिया की हस्तियों को अपने देश से अधिक विदेशी चीजें पसंद है। फेवरेट एक्टर पूछिए तो कोई विदेशी कलाकार का नाम सुनने को मिलेगा, फेवरेट शूटिंग डिस्टेनेशन भी विदेश ही, फेवरेट रायटर भी विदेशी ही, चाहे भले ही वे यह नहीं जानते हों कि प्रेमचंद कौन हैं। एक बार जब मैं कॉलेज में था तो पाकिस्तान टूर का प्लान कॉलेज की तरफ से बना। हमलोग बड़े खुश थे। हमारे एक प्रोफेसर ने क्लास में कहा कि आपलोगों में से कितनों ने राजगीर देखा है। मुशिकल से 4-5 हाथ उठे होंगे। उन्होंने कहा कि पहले अपने देश को जानों। अब समझ में आ रहा है कि उनहोंने कितना सही कहा।

इसी प्रोग्राम में जब रानी से हिन्दी में पूछा गया कि 47 को क्या कहते हैं तो उन्हें 70 नजर आ रहा था। जब देश के राष्ट्रपिता के बारे में ही जिसको जानकारी नहीं हो तो उससे हिन्दी के बारे में आशा करना शायद बेवकूफी होगी। एक बार बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन से जब पूछा गया कि आप अपने बेटे को सफल होने के लिए क्या सलाह देना चाहेंगे तो उन्होंने कहा था कि वे जब भी बोलें हिन्दी में बोलें। क्योंकि हमारे अधिकतर दर्शक हिन्दीभाषी ही हैं। इससे दर्शक जुड़ाव महसूस करते हैं। आज बॉलीवुड के अधिकतर सितारे इंग्लिश में ही बात करते हैं चाहे भले ही उनसे हिन्दी में सवाल पूछा जाए।

अंग्रेजियत की चकाचौंध में खोया हमारा बॉलीवुड अगर ऐसी फिल्में बनाता है जिसका समाज से कोई सारोकार नहीं होता तो क्या गलत है? यह चर्चा अब पुरानी हो चुकी है कि अब फिल्मों और टीवी पर भी आम आदमी गायब हो गया है। इसलिए मैं इसपर कुछ ज्यादा नहीं लिखूंगा। वैसे भी आज अंग्रेजीदार मॉल संस्कृति में तो आम आदमी घुटन महसूस करता है। उसके लिए तो वही गांव के चौक पर पान की दूकान, सस्ती सी सुपाड़ी और चमकीले भड़कीले कपड़े। उसी में हैं वे खुश। लेकिन बॉलीवुड को अपनी जिम्मेवारी समझनी होगी। समाज की बेहतरी के लिए बॉलीवुड की भी कुछ जिम्मेवारी बनती है। लेकिन रानी मुखर्जी और करन जौहर जैसे लोगों से मुझे कोई आशा नहीं है।

पाश्चात्य जगत में जब आधुनिक युग का प्रवेश हुआ तो उससे पहले अंधकार युग था। उस समय का यूरोपीय समाज शायद इतना रुढिवादी था जैसा भारतीय समाज भी कभी नहीं था। वहां आधुनिकता की बयार बही। यह बयार ग्रीक फिलॉसोफी में छिपी हुई थी। उन्होंने उसी को अपनाया। ग्रीक साहित्य में वो सबकुछ था जो एक समाज को आधुनिक बनाने के लिए आवश्यक हैं। स्वतंत्रता, समानता, साइंटिफिक टेम्परामेंट। यूरोपीय समाज ने उसको अपनाया। उन्होंने इसके लिए किसी दूसरे का अंधानुकरण नहीं किया। लेकिन हम कुछ और ही कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हमारी सभ्यता में ये सभी तत्व नहीं है। लेकिन हमने उसे अपनाया ही नहीं।